आमचा देवा धर्माला विरोध नाही.

भूमिका : हिंदी

अखिल भारतीय अंधश्रध्दा निर्मूलन समिति एक पंजीकृत सामाजिक संस्था है,जो विगत पचच्चीस वर्षो से समाज में सफलता पूर्वक वैज्ञानिक दृष्टिकोन के साथ वैचारिक अभियान चला रही है। परम्परावादी गुलाम मस्तिष्क को मुक्ति दिलाने के लिए चलाने को लिए चलाये जा रहे इस अभियान की सफलता का मूलाधार है समिती की अपनी स्पष्ट और सशक्त वैचारिक भूमिका। सन १९९३ में इस भूमिका को निर्धारित करने के लिए समिती के कार्यकर्ताओं का एक शिबिर महाराष्ट्र के लोनावला नगर में आयोजित किया गया था। ढाई दिन तक तर्क-कुतर्क के साथ वैचारिक मंथन होता रहा तब कहीं यह भूमिका एकमत से स्वीकारी गई। यह ठीक ऐसा ही हुआ जैसे दही में रई चलाकर मख्खन निकाल लिया हो। समिती के संस्थापक व राष्ट्रीय संगठक, चिन्तक प्रा. श्याम मानव ने यह भूमिका मूल रूप से मराठी में लिखी थी। यह काम ठीक ऐसा ही हुआ जैसे रेलगाडी दौडाने के लिए पहले पटरि बिछाई जाती है। जिसकी वजह से महाराष्ट्र में हजारों सामाजिक कार्यकर्ता समर्पित सेवा भाव से अंधश्रध्दा निर्मूलन अभियान में स्वयंफूर्त जुडते गए।
हमारी समिती के राष्ट्रीय महासचिव मा. हरीश देशमुख ने इस अभियान में राष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी करते समय तीव्र रूप से आवश्यकता महसूस की कि मरठी भाषा में लिखी गई समिती की इस भूमिका का हिन्दी में अनुवाद किया जाए। अंधश्रध्दा निर्मूलन अभियान को यदि राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचना है, तो यही समय की आवश्यकता भी है। उन्होंने इस कार्य के लिए अपने परिचित मित्र म.प्र. में बैतूल जिले की मुलताई तहसील के बिनसूर गांव में रहनेवाले मा. गुलाबराव गोहाडे भावुक को जिम्मेदारी सौंपी, जिस वजह से यह संभव हो सका।
मराठी में लिखी इसी भूमिका का आंग्रेजी अनुवाद समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रा. शरद पाटिल ने किया है।अब लग रहा है कि देश की अन्य सभी भारतीय भाषाओं में क्रमशः योजनाबध्द तरीके से समिति की भूमिका पुस्तिका प्रकाशित की जाय।विशेष तैर पर तामिल ,मलियालम, कन्नड और मेलगू ,उर्दू , बंगाली ,गुजराती ,उडिया, असामी में भी प्रकाशन के प्रयत्न किये जाय। तात्पर्य यह की यह भूमिका ही तो है,जो किसी भी सामाजिक कार्याकर्ता को वैचारिक परिवर्तन की दिशा में सोचने के लिये मजबूर करती है,वह अपने आप मे तर्क वितर्क करने लगता है,सत्य असत्य को परखाने लगता है। स्वंयस्फूर्त प्रोत्साहीत होता है और इसी कारण प्रगतिशील वैचारिक प्रवाह गति में शामिल हो जाता है।
कोई स्वीकार करे अथवा हम करते हैं कि इसी भूमिका के कारण ढोंग -पाखंड की परतें अब आसानी से खुलने लगी हैं।भूमिका के लेखक प्रा. मानव के कई तर्क अग्रेंजी की एक कहावत के अनिरुप होते हैं,जिसमें कहा गया हैं कि "रीद बिटवीन दि लाईन्स।" तात्पर्य यह कि भूमिका का अध्ययन क्रिये, समझिये और फिर सेवाकार्य में लगिये | भूमिका में साफ कहा गया है कि हमार देव (ईश्वर) अथवा धर्म का कोई विरोध नहीं।ईश्वर में आस्था रखने वाले धर्मिक प्रवृति के लिग भी हमारे साथ आकर ढोंग- पाखंड के खिलाफ सेवा कार्य कर सकते है, परन्तु साथ ही चेतावनी भरे स्वरों में मानव सहाब कहते हैं कि हमार इस मंच से ईश्वर अथवा धर्म के प्रचार की अनुमती नहीं होगी यही नहीं य्दि कोई कार्यकर्ता बाहर कुछ कहता है तो उसके ये विचार व्यक्तिगत माने जायेंगे। अब यह भी समज लीजिये